लतखोरी : हमारा ढीठ आदर्शवाद |

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अघोरी संत संदीप ढाका द्वारा लिखित

तीन नागरिक सम्मान है जिनमे मैं अक्सर कनफूजिया जाता हूँ कि कौन बड़ा-कौन छोटा – पदम् श्री ,पदमभूषण, पदमविभूषण |ऐसे ही मुझे कनफूजिया के लिए बेशरमी के भी तीन सम्मान है – नकटा, लीचड़, लतखोर |

दिमाग के हरएक कोने में सिस्का LED जलाकर कुल मिलाकर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि लतखोर हद दर्जे का सम्मान है, क्योंकि ‘नकटा’ होने के पीछे एक जिद होती है और ‘लीचड़’ होने के पीछे मज़बूरी पर
‘लतखोर’ ‘ढीठ आदर्शवादी’ बनकर ही बना जा सकता है | ढीठ आदर्शवाद बोले तो जैसे कि हम हजारों वर्षों से सेक्युलर बनने की कोशिश में लगे है |
भारत का मानचित्र देखकर मैं कई बार सोचने लग जाता हूँ ये तो एक पश्चिमी मार्ग ही खुला था भरत-खंड का, अगर चारों तरफ से मार्ग खुले होते तो हमारी ‘लतखोरी’ से हम कहाँ और कितना बचे होते ?
711 ई. में ही आ गया था 17 साल का लौंडा ‘मुहम्मद बिन कासिम’ हमें सेक्युलर बनाने पर दन्तिदुर्ग और नागभट्ट I ने कुछ सालों तक हमसे ये सौभाग्य छीन लिया |

लतखोर बनने के नफे-नुकसान को हमने सबसे पहले तब देखा जब ‘महमूद गजनबी’ ने ‘सुखपाल’ के इस्लाम स्वीकार करने पर उसे ससम्मान मुल्तान का शासक बनाया | जबकि अकेले हिन्दुशाही राज्य पर 5-6 बार
उसने आक्रमण किया और ‘सुखपाल’ के इस्लाम त्यागने भर से तथाकथित सबक सिखाने वापिस आया | इतिहासकार उतबी और अलबरूनी ने सीधा-सीधा बोला कि उसका उद्देश्य सिर्फ ‘इस्लाम प्रचार’ था |
तराईन की दूसरी लड़ाई के बाद ‘पृथ्वीराज चौहान’ की आँखों में गर्म सलाखें डालते हुए ‘मोहम्मद गोरी’ ने जरुर ये ही कहा होगा कि ” तराईन की पहली लड़ाई के बाद मुझे भागता देख क्या तुम्हें वो सलूक याद नही आया
जो वैहिंद के द्वितीय युद्ध के बाद में पराजित सैनिकों के साथ किया गया था ?”

हाल ही में ‘तैमुर लंग’ के नाम पर हमने खूब ‘लतखोरी’ का परिचय दिया | कबूतर ने आँखें मूंद ली, खुली रखता तो देखता कि तैमुर लंग की लिखी जीवनी ‘तुजुके-तैमूरी’ की पहली पंक्ति है- “काफिरों और पैगम्बर में
विश्वास न लाने वालों से युद्ध करो और उन पर सख्ती बरतो |”
अकबर का वक्त आते-आते लतखोरी चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी और बगावत करने की जो सजा ‘हेमू’ को दी गई और एक मुस्लिम सरदार को दी गई उसमें अंतर नही कर पाए |
किसी लिखने वाले ने कहा है कि “वर्तमान अतीत की ही उपज है | अतीत का परिणाम ही वर्तमान है और अतीत को हम इतिहास कहते है |” दृष्टिपात किया जाये तो इतिहास शब्द इति ‘ह’ ‘आस’ से बना है जिसका
अर्थ है “निश्चित रूप से ऐसा हुआ|” दुसरे शब्दों में कहा जाए तो “Authenticity” के नाम पर इतिहास लेखन में हमें जो परोसा गया |
उदहरण के रूप में हम ‘विसेंट स्मिथ’ के नाम के आगे ‘जाना-माना इतिहासकार’ शब्द लगते है जिसने “अर्ली हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया” में लिखा कि “सिकन्दर ने हिमालय से समुद्र तक भारत को जीता|” पर हेमचन्द्र
राय चौधरी को नही जानते जिन्होंने उसके एक-एक तर्क की बखिया उधेड़ी | वेदों का विश्लेषण करने वाले मैक्समुलर को कौन नही जानता | ‘सैक्रेड बुक्स ऑफ़ दी ईस्ट’ में वेदों का भ्रामक स्वरूप पेश करने से
पहले उसने भारत-मंत्री ‘ड्यूक ऑफ़ आरगिल’ को लिखा “भारत के प्राचीन धर्म का विनाश होने वाला है और यदि इसाई धर्म इसका स्थान नही लेता तो दोष किसका है |”
हमारी इस आदत को क्या नाम दिया जाएँ ? शीर्षक एक बार फिर से पढिए आप जान जाएँगे |

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